सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मामले को परंपरा और आस्था का विषय बताया केंद्र ने admin, April 10, 2026April 10, 2026 नई दिल्ली। सबरीमाला मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने महत्वपूर्ण पक्ष रखा है। केंद्र ने कहा कि कुछ मंदिरों में पुरुषों या महिलाओं के प्रवेश से जुड़े नियम लिंग भेद नहीं बल्कि धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं पर आधारित होते हैं। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली संवैधानिक पीठ के समक्ष केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि यह मामला केवल समानता का नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था और परंपरा का भी है। ⚖️ परंपरा बनाम समानता पर बहस केंद्र ने कोर्ट में बताया कि देश में कई ऐसे मंदिर हैं जहां परंपरा के अनुसार पुरुषों या महिलाओं के प्रवेश पर विशेष नियम लागू होते हैं। उदाहरण के तौर पर कुछ मंदिरों में पुरुषों का प्रवेश प्रतिबंधित है, जबकि कुछ स्थानों पर विशेष परिस्थितियों में ही महिलाओं को प्रवेश दिया जाता है। 🛕 अलग-अलग परंपराओं का सम्मान जरूरी सरकार का कहना है कि हर मंदिर और संप्रदाय की अपनी अलग धार्मिक मान्यताएं होती हैं, जिन्हें संविधान के तहत संरक्षण प्राप्त है। इसलिए इन मामलों में एक समान नियम लागू करना उचित नहीं होगा। 📜 संवैधानिक प्रावधानों का हवाला सुनवाई के दौरान संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लेख करते हुए कहा गया कि धार्मिक संस्थाओं को अपने रीति-रिवाजों और प्रथाओं के अनुसार कार्य करने की स्वतंत्रता है। 🔍 न्यायिक समीक्षा की सीमाएं केंद्र ने यह भी स्पष्ट किया कि धार्मिक परंपराओं और प्रथाओं के मामलों में न्यायिक समीक्षा की सीमा सीमित होनी चाहिए, क्योंकि यह आस्था से जुड़ा विषय है। Temple & Religious Updates आस्था बनाम समानतातुषार मेहताधार्मिक परंपराधार्मिक स्वतंत्रताभारत समाचारमंदिर प्रवेश नियमसबरीमाला केससंविधान अनुच्छेद 25सुप्रीम कोर्ट